Uttarakhand25: बेशक एक नए राज्य के स्वाभाविक फायदे मिले। लेकिन राज्य गठन के 25 साल पूरे होने पर भी पहाड़ बनाम मैदान की खाई पाटने की बजाय गहरी की जा रही है। सूबे की रजत जयंती के अवसर पर हालिया ‘विशेष सत्र’ के दौरान विधानसभा में क्षेत्रीय हितों के लिए विधायकों में कड़वाहट चिंता बढ़ाती है।
By Rahul Singh Shekhawat
देखते ही देखते उत्तराखंड अपनी स्थापना के ‘रजत वर्ष’ में प्रवेश कर गया है। तत्कालीन उत्तरप्रदेश से अलग राज्य की मांग को लेकर 1994 में जनसैलाब सड़कों पर उतरा। पुलिस ने खटीमा, मसूरी, नैनीताल और देहरादून में आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाईं और कई स्थानों पर लाठीचार्ज किए। उस दौरान गांधी जयंती पर तो दिल्ली मुजफ्फरनगर तिराहे पर पुलिसिया हैवानियत की नई इबारत लिखी गई। तब न सिर्फ गोलियां चलीं बल्कि औरतों ने बलात्कार तक झेला।
समूचे राज्य आंदोलन में 42 शहादतें हुईं। जिसके बाद 9 नवम्बर 2000 को हिंदुस्तान के नक्शे पर उत्तराखण्ड एक नए राज्य के तौर पर उभरा।अतीत इस बात का गवाह है कि बीते 25 सालों में 12 बार सरकारों के शपथ ग्रहण हुए हैं। इस दौरान भाजपा और कांग्रेस के 10 लोग मुख्यमंत्री बने। इस कड़ी में पुष्कर सिंह धामी सूबे की बागडोर संभाल रहे हैं। जिनके नेतृत्व में राज्य में पहली बार सरकार रिपीट हुई। वरना चुनाव दर चुनाव में सरकार बदलने का सिलसिला रहा है।
बतौर मुख्यमंत्री कांग्रेस के स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी ही पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में सफल हुए। गौरतलब है कि राज्य गठन के वक्त स्वर्गीय नित्यानंद स्वामी भाजपा की अंतरिम सरकार की बागडोर संभालने वाले इतिहास पुरूष बने। उन्हें बेदखल कर 4 महीने सत्ता संभालने वाले भगत सिंह कोश्यारी को जनता ने पहले आम चुनाव में नकार दिया और कांग्रेस को बहुमत मिला। पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया बने एन डी तिवारी ने उत्तराखंड में आधारभूत ढांचे और औद्योगिक विकास की बुनियाद रखी।
दूसरी विधानसभा के कार्यकाल में भाजपा के रिटायर्ड मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूरी ने उस सिलसिले को आगे बढ़ाया। लेकिन उन्हें कड़क मिजाजी से उभरे विधायकों के असंतोष और 2009 के लोकसभा चुनावों में हार का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। जिसके चलते रमेश पोखरियाल निशंक ने उन्हें रिप्लेस किया। उन्हें सिटरजिया भूमि मामले में घिरने और विद्युत परियोजना आबंटन में कथित भ्रष्टाचार के आरोप चस्पा होने पर आम चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। तत्कालीन ‘अन्ना आंदोलन’ की हवा के बीच भाजपा हाईकमान ने खंडूरी पर दुबारा दांव लगाया।
तीसरी विधानसभा के कार्यकाल में विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस की गठबंधन सरकार गठित हुई। जिन्होंने गैरसैंण में ‘ट्रांजिट एसेंबली’ का शिलान्यास करके एक नया इतिहास बनाने की अधूरी कोशिश की। लेकिन ‘केदारनाथ आपदा’ से निपटने में नाकामी उनके हटने का कारण बना। उनके बाद मुख्यमंत्री बने हरीश रावत ने इच्छा शक्ति दिखाते हुए आपदा के खौफ से उबारने में बड़ी भूमिका निभाई।
हरीश रावत ने गैरसैंण में टैंट तंबूओं में विधानसभा सत्र आयोजित करके उत्तराखंड में एक नई इबारत लिख डाली। लेकिन कथित ‘एकला चलो’ नीति के खिलाफ बीजेपी के संरक्षण में बहुगुणा खेमे के विधायकों ने सरकार गिराई और राष्ट्रपति शासन लगा। रावत सरकार सुप्रीम कोर्ट की दखल से तो बहाल हुई लेकिन आम चुनावों में बेदखल हो गयी।
भाजपा को ‘मोदी युग’ में हुए चौथी विधानसभा के चुनावों में प्रचंडतम बहुमत मिला। त्रिवेंद्र सिहं रावत को सूबे की बागडोर सौंपी गई थी। उनके कार्यकाल में गैरसैंण को ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ का दर्जा दिया। बेशक त्रिवेंद्र के कार्यकाल में भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ सख्ती दिखी। लेकिन भाजपा हाईकमान ने कथित संवादहीनता के चलते पनपे असंतोष और कतिपय विवादास्पद फैसलों की छाया की वजह से उन्हें आनन फानन में हटा दिया।
इस कड़ी में तत्कालीन सांसद तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया और महज 4 महीने बाद चलता कर दिया गया। वह शायद ही इस पहेली का उत्तर ढूंढ पाएं हो कि आलाकमान ने उनके साथ मजाक किया या उपकार। उन्हें बाद हटाकर राज्य में पांचवे आम चुनावों से ठीक पहले युवा विधायक पुष्कर सिंह धामी के सिर पर ताज सजाया गया। भाजपा को अप्रत्याशित रुप से लगातार दूसरी बार बहुमत मिला। उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा चुनाव में पुष्कर खुद चुनाव हार गए, लेकिन मोदी का उन पर भरोसा कायम रहा।
धामी सरकार ने समान आचार संहिता कानून (UCC), कथित जबरन धर्मांतरण और लव जेहाद के खिलाफ कानून बनाए हैं। कथित अवैध मजारों के ध्वस्तीकरण से साफ है कि धार्मिक या फिर कहें ‘सांप्रदायिक ध्रुवीकरण’ धामी सरकार की प्राथमिकता में है। हालांकि, उनके कार्यकाल में सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 30 फीसदी क्षैतिज आरक्षण और राज्य आंदोलनकारियों के लिए 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण, पेपर लीक और नकल के खिलाफ कानून भी बने हैं। हालांकि इसके बावजूद पिछले दिनों एक राज्य स्तरीय परीक्षा में पेपर लीक के हुआ। छात्र आंदोलन के दबाव में उसे कैंसिल करके सीबीआई जांच की संस्तुति की गई।
उत्तराखंड के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 378 हजार करोड़ रुपये होने का अनुमान है। राज्य की आर्थिक विकास दर करीब 7.83 फीसदी है। उत्तर प्रदेश से अलग होने पर सूबे की प्रति व्यक्ति आय करीब 15,285 रू. थी। जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में छलांग मारते हुए 2 लाख 74 हजार रु. तक अनुमानित है। जोकि राष्ट्रीय औसत से कमोबेश दो लाख रुपए अधिक है। इस कड़ी में राज्य गठन के वक्त रहे सालाना बजट का आकार 4505.75 करोड़ से बढ़ते हुए मौजूदा वित्तीय वर्ष में 101,17533 करोड़ तक पहुंच गया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि मूलभूत सुविधाओं में भी इजाफा हुआ। स्कूल-विश्वविद्यालय और अस्पतालों की संख्या में वृद्धि हुई और एम्स और आई आई एम सरीखे संस्थान स्थापित हुए। बेशक चारधाम ऑल वेदर रोड और ऋषिकेष- कर्णप्रयाग रेल परियोजना से उम्मीदों के नए पंख लगे हैं। लेकिन बेरोजगारी की समस्या का समाधान नजर नहीं आ रहा। ऐसी कोई सरकार नहीं जिस पर भ्रष्टाचार का ग्रहण न लगा हो।
राज्य गठन के 25 साल बाद भी समुचित सुविधाओं के अभाव में पहाड़ से पलायन का सिलसिला नहीं थम रहा। अल्मोड़ा और पौडी जिलों के आंकड़े तो डराने वाले हैं। जहां, उत्तर प्रदेश के दौर में पहाड़ से लोग महानगरों को रूख करते थे। वहीं, उत्तराखंड में देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंहनगर और नैनीताल के मैदानी इलाकों में बसने को तरजीह दे रहे हैं। जिससे पहाड़ वीरान हो रहे और तराई-मैदान के भूभाग पर बेतहाशा दबाव बढ़ रहा है। साल दर साल कृषि भूमि का क्षेत्रफल घटता जा रहा है।
तत्कालीन यूपी के पहाड़ी इलाकों में भौगोलिक परिस्थितियों, विकास और प्रशासनिक उपेक्षा से छुटकारा पाने को ही एक अलग पर्वतीय राज्य की मांग बुलंद हुई थी। लेकिन पहाड़ी नेता सुविधाओं के लिए चुनाव लड़ने के लिए मैदान में सीटें तलाश रहे हैं। अगर अपवाद छोड़ दें तो कमोबेश हर सरकार के कार्यकाल में उत्तराखंड में अफसरशाही नजर आई।
दरअसल, पर्वतीय राज्य की मांग थी लेकिन उसमें भविष्य की व्यवहारिक जरूरतों के मद्देनजर मैदानी भू- भाग भी शामिल किया गया। पहाड़ बनाम मैदान के वोट गणित में ‘स्थायी राजधानी’ का मुद्दा उलझ गया। विधानसभा के हालिया ‘विशेष सत्र’ के दौरान क्षेत्रीय हितों के लिए विधायकों में टकराव ने उसकी फिर पुष्टि कर दी। बेशक, उत्तराखंड को एक नए राज्य के स्वाभाविक फायदे मिले हैं। लेकिन समग्र और संतुलित विकास का ऐसा मॉडल विकसित नहीं हो पाया, । अलबत्ता सियासी महत्वाकांक्षा में आम जनमानस की उम्मीदों पर भारी पड़ी हैं।
(लेखक वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार हैं)