पत्रलेखन ‘नए-भारत’ में कला है या फिर बला !

By सुशील राय

पत्राचार में पत्र और आचार
सब हो गये तार-तार,
फिर भी जय बोलो माननीय की
जय बोलो सरकार!

संवैधानिक पदों पर बैठे माननीयों के बीच ‘पत्राचार’ देखकर तो यही लगता है कि ये ‘पत्र’ नहीं बल्कि कोई तीर थे। जो एक-दूसरे को गहरी चुभन देने के लिए तेजी से आगे निकल गये। ‘आचार’ बिचारा लाचार होकर किसी कोने औंधे मुंह पड़ा रहा। हमें सिखाया गया कि पत्र लेखन एक कला है। लेकिन अब लगता है कि बहुत बड़ी बला है। हम लोगों को समझाया गया कि पत्र की भाषा शिष्ट होनी चाहिए। लेकिन यहां अशिष्ट भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता!

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इस कविता को याद करना जरूरी !

जैसे कभी श्री केदारनाथ सिंह जी ने एक कविता लिखी थी कि –

जहां लिखा है प्यार
वहां लिख दो सड़क
कोई फर्क नहीं पड़ता,
हमारे युग का मुहावरा है
कोई फर्क नहीं पड़ता।

वैसे भी जब मैं यह सबकुछ लिख रहा था तो यकीन मानिए मुझे खुद का जाहिलपना भी दिख रहा था।  क्यों ये सब लिख और सोच रहे हो? समय जाया कर रहे हो ! हम लोगों के कहने-लिखने से आखिर क्या बदल जायेगा? सच कहें तो हमें कुछ कहने का अधिकार भी तो नहीं, क्योंकि हम आमजन हैं।

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अब पत्रलेखन पढ़ाई-लिखाई नहीं  ढिठाई की जरूरत !

राजपद के वैभव से कोसों दूर, निरे वंचित जन। इन भद्रजनों के बारे में कुछ मत कहो। कुछ मत लिखो, क्योंकि यही हमारे भाग्य विधाता हैं। इन्हीं के करतूत से आमजन का भाग्य बनता और बिगड़ता है। कुछ भी कह-सुन लो, ताउम्र यही हमारी अगुआई करेंगे। जो कहेंगे, न चाहते हुए भी हमसब सुनेंगे। आखिर तक चुपचाप सहेंगे।

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हम सबने पत्रलेखन की अमूमन  कई किताबें भी पढ़ीं। अभी भी तमाम शिक्षक यूट्यूब पर हांफ-हांफकर पत्रलेखन कला पढ़ा रहे हैं। तरह -तरह से समझा रहे हैं। अब इनको कौन समझाए कि अब आप एक नए युग में हैं। जहां पत्र लिखने के लिए पढ़ाई-लिखाई नहीं है। बल्कि ढिठाई की जरूरत है। उसके लिए ‘होशियारी’ चाहिए और एक खास उद्ध.. मतलब ‘उद्धरण’ भी।

 

(लेखक पत्रकारिता शिक्षण से जुड़े हैं और व्यंग्यात्मक आलेख में उनके निजी विचार हैं)

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