International Women’s Day: अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में महिला मजदूरों ने बड़ा मार्च निकाला। उनकी मांगें थी बेहतर वेतन, कम कार्य घंटे और मतदान का अधिकार। जिसके परिणामस्वरूप 1909 में अमेरिका में पहली बार “राष्ट्रीय महिला दिवस” मनाने की घोषणा हुई। दुनिया के कई देशों में महिलाओं को समान अधिकार पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। लेकिन भारत में संविधान लागू होते ही उन्हें पुरुषों के समान रूप से वोट देने का अधिकार मिल गया
By Dr. Prem Bahukhandi
(International Women’s Day) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का मूल विचार न्याय, समानता, मानवीय गरिमा और सामाजिक परिवर्तन पर आधारित है। सन् 1908 में, अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में लगभग 15,000 महिला मजदूरों ने एक बड़ा मार्च निकाला। उनकी मांग थी- बेहतर वेतन, कम कार्य घंटे और मतदान का अधिकार।
इस आंदोलन का असर इतना बड़ा था कि 1909 में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहली बार “राष्ट्रीय महिला दिवस” मनाने की घोषणा की।
1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसमें महिलाओं के अधिकारों और उनके मताधिकार के लिए आवाज उठाई, इसमें 17 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
इसके बाद 1911 में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया- लोग सड़कों पर उतरकर महिलाओं के मतदान के अधिकार, काम करने के अधिकार, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी की मांग कर रहे थे।
1917 में रूस में एक और ऐतिहासिक घटना हुई। पेट्रोग्राद शहर की महिला कपड़ा मजदूरों ने “रोटी और शांति” की मांग करते हुए हड़ताल कर दी। यह आंदोलन इतना बड़ा बन गया कि आगे चलकर रूसी क्रांति का एक कारण बना।
(International Women’s Day)1975 में संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे आधिकारिक रूप से मनाना शुरू किया, और तब से यह दिन पूरे विश्व में बड़े स्तर पर मनाया जाने लगा।
8 मार्च, समानता, सम्मान और अधिकारों के लिए हुए, संघर्ष को याद करने का दिन है.
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इतिहास बताता है कि महिलाओं को मताधिकार, जिसे भारत में सामान्य माना जाता है, का अधिकार आसानी से नहीं मिला। इसके लिए उन्हें लंबे समय तक आंदोलन और संघर्ष करने पड़े।
उदाहरण के लिए,
• अमेरिका में महिलाओं को 1920 में वोट देने का अधिकार मिला। इसके लिए वहाँ कई वर्षों तक आंदोलन और जनसभाएँ हुईं, तब जाकर संविधान में संशोधन करके यह अधिकार दिया गया।
• इंग्लैंड में भी महिलाओं को धीरे-धीरे यह अधिकार मिला। 1918 में केवल 30 वर्ष से अधिक आयु की कुछ महिलाओं को ही वोट देने की अनुमति दी गई थी। बाद में 1928 में पुरुषों के समान अधिकार देते हुए 21 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया गया।
• स्विट्ज़रलैंड जैसे विकसित देश में भी महिलाओं को यह अधिकार बहुत देर से मिला। वहाँ राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को 1971 में वोट देने का अधिकार मिला।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि दुनिया के कई देशों में महिलाओं को समान अधिकार पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा।
लेकिन भारत में 1950 में संविधान लागू होते ही महिलाओं और पुरुषों दोनों को समान रूप से वोट देने का अधिकार मिल गया। यह हमारे लोकतंत्र की एक बहुत बड़ी ताकत है। इसके लिए धन्यवाद् महात्मा गाँधी जी, धन्यवाद पंडित जवाहर लाल नेहरु जी, धन्यवाद सरदार पटेल जी और धन्यवाद संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ भीम राव अम्बेडकर जी, और धन्यवाद संविधान सभा के उन सभी सदस्यों को जिन्होंने समानता के इस अधिकार का समर्थन किया था. International Women’s Day
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और कांग्रेस से जुड़े हैं, इस आलेख में उनके निजी विचार हैं)