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Nehru’s relationship with Uttarakhand अटूट बंधन है!

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By Jai Singh Rawat
Nehru’s relationship with Uttarakhand भारत के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru का जन्म 14 नवंबर 1889 को हुआ था।  देहरादून और अल्मोड़ा की खामोश जेलें बिन कहे उनका उत्तराखंड से नाता बयां करती हैं। दरअसल,  स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान Jawaharlal Nehru  करीब 3,259 दिन तक जेल में रहे। उन्होंने सबसे पहले लखनऊ जेल में 6 दिसम्बर 1921 से लेकर 3 मार्च 1922 तक कुल 88 दिन काटे। उनको जब नवीं बार गिरफ्तार किया गया तो कुल 1041 दिन अल्मोड़ा जेल में रखा गया। देहरादून की पुरानी जेल के एक वार्ड में स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान पण्डित नेहरू को 4 बार कैद कर रखा गया था। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नेहरू को सबसे पहले 1932 में देहरादून जेल के इस वार्ड में रखा गया था। उसके बाद 1933, 1934 और फिर 1941 में उन्हें यहां रखा गया था। उत्तराखंड की जेलें उनके लिए घर समान थीं।

नेहरू ने देहरादून से लगाई थी सियासी छलांग

नेहरू जी ने राजनीति पहली लम्बी छलांग देहरादून में ही रखी थी। दरअसल सन् 1920 में जब देहरादून में कांग्रेस ने राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया तो उसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू ने ही की थी। विलायत से लौटने के बाद उनका यह पहला राजनीतिक कार्यक्रम था। इस सम्मेलन में लाला लाजपत राय और किचलू जैसे बड़े नेता शामिल हुये थे। सन् 1922 में भी देहरादून में एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ और उसकी अध्यक्षता भी पंडित नेहरू ने ही की थी। उस सम्मेलन में सरदार बल्लभ भाई पटेल और चितरंजन दास जैसे बड़े नेताओं ने भाग लिया था।
देहरादून और यहां की जेल नेहरू के लिये घर जैसे ही थे। एक बार जब अफगान प्रतिनिधि मण्डल देहरादून पहुंचा तो नेहरू को जिला छोड़ने का आदेश हुआ। क्योंकि जिस चार्लविले होटल में नेहरू ठहरे थे, उसी में अफगान प्रतिनिधि मण्डल को भी ठहराया गया था। देसी रियासतों में लोकतांत्रिक आन्दोलनों के लिये कांग्रेस द्वारा गठित ‘‘आल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेस’’ के पहले अध्यक्ष नेहरू ही थे और उनके बाद पट्ठाभि सीतारमैया अध्यक्ष बने थे। टिहरी का प्रजामण्डल इसी संगठन से सम्बद्ध था।

 Nehru’s relationship with Uttarakhand, 

जवाहरलाल नेहरू की उत्तराखण्ड और खास कर देहरादून से कई यादें जुड़ी हुयी हैं। सन् 30 के दशक श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में कहा था कि उत्तराखण्ड की विशेष भौगोलिक परिस्थिति के साथ ही अलग सांस्कृतिक पहचान है, इसलिये क्षेत्रवासियों को अपनी अलग पहचान बनाये रखने का हक हैं। उत्तराखण्ड के बारे में इस तरह की टिप्पणी करने वाले वह पहले राष्ट्रीय नेता थे। बाद में 1952 में नेहरू के इस वाक्य की प्रासंगिकता तब सामने आयी जबकि कामरेड पी.सी. जोशी की अध्यक्षता में भारतीय कम्युनिट पार्टी ने अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग कर डाली। फिर उत्तराखण्ड आन्दोलन में नेहरू का यह सूक्ति वाक्य भी आन्दोलनकारियों के काम आया। हिमाचल को पंजाब से अलग राज्य बनाने की परमार की मुहिम को भी नेहरू का ही आशीर्वाद प्राप्त था।

पंडित नेहरू ने जीवन के अंतिम चार दिन देहरादून में रहे

नेहरू उत्तराखण्ड से भावनात्मक तौर पर जुड़े रहे। जेल जीवन के अलावा भी उनका यहां निरन्तर आना जाना रहा है। उन्हें पहाड़ों की रानी मसूरी भी काफी पसन्द थी। वह अपने पिता मोतीलाल नेहरू और माता स्वरूप रानी के साथ सबसे पहले 1906 में मसूरी तब आये थे जब वह 16 साल के थे। उसके बाद वह अपने माता पिता के अलावा बहन विजय लक्ष्मी पंडित, बेटी इंदिरा गांधी और नातियों के साथ आते जाते रहे। अपने जीवन के कुछ अन्तिम पल उन्होंने यहां बिताये थे। 27 मई 1964 को मृत्यु से एक दिन पहले नेहरू देहरादून से वापस दिल्ली लौटेे थे।
दरअसल वह कांग्रेस के भुवनेवर अधिवेशन में हल्का दौरा पड़ने के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिये 23 मई 1964 को देहरादून पहुंच गये थे। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने मसूरी और सहस्रधारा की सैर भी की। देहरादून का सर्किट हाउस जो आज राजभवन बन गया, नेहरू के आतिथ्य का गवाह है। नेहरू के हाथ से लिखा हुआ प्रशस्ति पत्र आज भी सर्किट हाउस की दीवार पर चिपका हुआ है। हालांकि उस याद पर भी न जाने कब पानी फेर दिया जाय! तत्कालीन विधायक गुलाब सिंह के आमंत्रण पर नेहरू चकराता भी गये थे जहां उन्होंने प्रकृतिपुत्रों की जनजातीय संस्कृति का करीब से आनन्द उठाया। जिससे Nehru’s relationship with Uttarakhand का पता चलता है।
देहरादून से कालजयी ग्रन्थ की शुरुआत की थी
कहा जाता है कि महात्मा गांधी को सरदार पटेल से अधिक नेहरू इसलिये भी पसन्द थे कि वह धारा प्रवाह अंग्रेजी और हिन्दी बोलने के साथ ही उनमें लेखन की अद्भुत क्षमता थी और इसके लिये वह बहुत अध्ययन करते थे। इसी वजह से वह भारत से बाहर भी सबसे लोकप्रिय भारतीय नेता थे। नेहरू जी ने एक दर्जन से थोड़े ही कम ग्रन्थ लिखे जिनमें डिस्कवरी ऑफ इंडिया, एन ऑटोबाइग्रेफी ( टुवार्ड्स फ्रीडम) ए ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री, लेटर फॉर नेान, लेटर फ्राम अ फादर टु हिज डॉटर एवं द युनिटी ऑफ इंडिया जैसे कालजयी ग्रन्थ शामिल हैं।
इनमें से एन ऑटोबाइग्राफी की शुरुआत देहरादून जेल से ही की थी। इस ग्रन्थ में उन्होंने पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य और देहरादून का उल्लेख किया है। भारत के लिये नेहरू की जेल की कोठरी इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेहरू को अपनी विख्यात पुस्तक ”डिस्कवरी आफ इण्डिया“ लिखने की यहीं सूझी थी और उस पुस्तक के अधिकांश हिस्से इसी कोठरी में लिखे गये थे। नेहरू को उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी इसी वार्ड में मिलने आती थी।
नेहरू परिवार का देहरादून से गहरा नाता रहा
जवाहरलाल ही नहीं बल्कि पूरे नेहरू परिवार को देहरादून-मसूरी से विशेष लगाव रहा। देखा जाय तो कांग्रेस में होते हुये भी मोतीलाल नेहरू ने अपनी ‘‘इण्डिपेंडेंट पार्टी’’ की नींव भी देहरादून में ही रखी थी। गया काग्रेस में जाने से पहले इस पार्टी के सभी नेता देहरादून में एकत्र हुये थे और मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुयी बैठक में नयी पार्टी के गठन का प्रस्ताव पारित हुआ था। मसूरी के लोग मोतीलाल को शायद कभी भूलें!
सर्वविदित है कि मसूरी के मॉल रोड पर हिन्दुस्तानियों का प्रवेा वर्जित था। सड़क के प्रवेश द्वारा पर ही बोर्ड लटका हुआ होता था जिसमें लिखा होता था कि ‘‘इंडियन्स एण्ड डॉग्स आर नॉट अलाउड’’। मोतीलाल नेहरू मसूरी प्रवास के दौरान सदैव जुर्माना भर कर मॉल रोड की प्रातः कालीन सैर कर अंग्रेजों के गुरूर पर प्रहार करते थे। ये तमाम बाते Nehru’s relationship with Uttarakhand की तस्दीक करती हैं।
लेकिन आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर मनाए जा रहे अमृत महोत्सव में नेहरू की उपेक्षा साफ नजर आ रही है। लगता है जैसे नेहरू ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान अपने बाप-दादा के वैभव का लुत्फ उठाने के सिवा कुछ नहीं किया। और जो कुछ किया भी वह देशहित में नहीं किया। सच है कि पैतृक वैभव की उनके पास कमी नहीं थी। इलाहाबाद का आनन्द भवन इसका गवाह है, जिसे बाद में कांग्रेस को दे दिया गया। उनके पिता मोती लाल देश के चोटी के वकील थे और दादा गंगाधर नेहरू दिल्ली के अंतिम कोतवाल थे। देहरादून और अल्मोड़ा आदि की खामोश जेलें बिन कहे नेहरू के योगदान की सच्चाई बयां करती हैं
(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं और आलेख में उनके निजी विचार हैं)
Photo साभार FB

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